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SOCIETY NAME SUGGESTED BY MR. JUSTICE MANMOHAN SARIN LOKPAL DELHI THE THEN JUSTICE HON'BLE
DELHI HIGH COURT IN CWP NO. 3390 OF 2000 RAJESH KUMAR BHARTI VS GOVT. OF INDIA
 
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जनहित अपील

आप सभी नागरिक भी अपने-अपने राज्यों के लोक सूचना आयोगों के सम्मुख इस तरह की अपील दायर सकते है। एक पहल करने के बाद ही परिवर्तन की शुरूआत होती है। अगर इतिहास के परिवर्तनों को देखा जाए। उन परिवर्तनों मे पहले एक जागरूक नागरिक ने ही कदम उठाया और बहुत बड़े परिवर्तन हो गए।


जनहित अपील


सम्मुखः प्रमुख अपील प्राधीकरण एवं केन्द्रीय जनसूचना आयोग, पुराना जे.एन.यू परिसर, कल्ब बिल्डिंग, आर.के. पुरम, नई दिल्ली- 110067
   
                    जनहित अपील क्रमांक............................... वर्ष 2011

    राजेश कुमार भारती।
पत्राचार पताः
मार्फत- राष्ट्रीय अध्यक्ष- पीप्ल्स आल इन्डिया एन्टी करपषन एन्ड क्राईम प्रिवेन्षन् सोसायटी, रामकिषन दूबे हाऊस, मकान न॰ 201, नहरवाली गली, गांव सिघंु, दिल्ली- 40,  निजि सहायकः  8802861013
                                                                          ........................अपीलार्थी
                    बनाम
   
1.    प्रमुख सचिव भारत सरकार एवं केन्द्रीय मुख्य लोक प्राधिकारी, केन्द्रीय सचिवालय नार्थ ब्लाक, नई दिल्ली
2.    भारत के सभी राज्यों के मुख्य सचिव एवं राज्य मुख्य लोक प्राधिकारी।
3.    भारत के सभी केन्द्रीय शासित प्रदेशों के प्रशासक एवं मुख्य लोक प्राधिकारी।                                             .
                                                             ...........................दोषिगण

    सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अर्न्तगत सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) में दर्षायी गई धारा- 4 की उपधारा-1 को समस्त भारत में लागू कराने बारें में जनहित अपील।

   माननीय आयोग,

        माननीय आयोग को सूचित किया जाता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) में स्पष्ट लिखा है कि धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना इस अधिनियम के शेष उपबन्ध अधिनियम के लागू होने के 120 दिन के अन्दर-2 प्रवृत होगे। लेकिन बहुत ही चिन्ताजनक विषय है कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के मुख्य लोक प्राधिकारियों ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-1 (3) की पालना में धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना आजतक पूर्णरूप से नही की है। जिसका परिणाम यह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारतीय नागरिकों के लिए सुकर नही हो पा रहा है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को इसलिए बनाया गया था कि भारतीय नागरिकों को जनसूचना के साथ केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के सभी लोक प्राधिकारियों के नाम, पदनाम, कर्त्तव्यों, शक्तियों और पत्राचार पते  और लोक प्राधिकारियों को जनहित में सरकारों के द्वारा दिये गए मोबाईल व टेलीफोन नग्बर सुलभ हो सके। जिससें लोक प्राधिकारी नागरिकों के सर्म्पक मे रहे और प्रशासन की कार्यशैली में पारदर्शिता आ सके और नागरिकों को जनसूचना पाने और अपने कष्टों का निवारण करवाने में आसानी हो सके।

        माननीय आयोग को यह भी सूचित किया जाता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू होने के बाद सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा- 4 की उपधारा-1 की पालना में भारत के मुख्य लोक प्राधिकारीयों के द्वारा वेबासाईटो का निर्माण तो करा दिया गया है लेकिन उन वेबसाईटों पर सभी लोक प्राधिकारियों के नाम, पदनाम, पत्राचार पते पिन कोड सहित, उनके कर्त्तव्य और शक्तियों का विवरण नही दिया गया है। केवल ई-मेल और फोन नम्बर दिये गए है। लेकिन वह भी झूठे है। जब जनसाधारण इन ई-मेल पतो और टेलीफोन नम्बरों का उपयोग करके लोक प्राधिकारीयों को अपनी समस्यों के समाधान हेतू सर्म्पक करते है तो टेलीफोन नग्बर मिलते ही नही है और कम्पयूटरीकृत सदेंष आता है मिलाया गया नम्बर गलत है या स्थाई तौर पर बन्द है और अगर भारतीय नागरिक लोक प्राधिकारण की वेबसाईट में दर्शाये लोक प्राधिकारियों को ई-मेल के माध्यम से अपनी समस्या भेजते है। तो वह भी असफल होती है और उनके मेल पर फेलियर नोटिस आ जाता है कि यह मेल स्थाई तौर पर बन्द है। (जोकि आई.पी.सी. की धारा- 466 और 474 के अर्न्तगत घोर दण्डनीय अपराध है) यह हाल केवल भारत के लोक प्राधिकारियों का ही नही है बल्कि भारत के केन्द्रीय जनसचूना आयोग और राज्यों के मुख्य जनसूचना आयोगों के कार्यालयों की वेबसाईटों का भी है। जोकि बहुत ही चिन्ता जनक बात है।

        इसके अतिरिक्त अपीलार्थी आपको विशेषतौर पर सूचित करता है कि लोक प्राधिकरणों की वेबसाईटों पर लोकप्राधिकारियों के सर्म्पक का ब्योरा न होने के कारण सभी लोक प्राधिकारी जनसाधारण से बिलकुल कटे हुए है और सभी लोक प्राधिकारियों ने अपनी-2 वेबसाईटों पर अपने पत्राचार पते और असल टेलीफोन और मोबाईल नम्बर इसलिए नही दर्शाये है कि अगर भारतीय नागरिकों को उनके पत्राचार पतों, टेलीफोनों और मोबाईल नम्बरों का पता चल जाऐगा तो भारतीय नागरिक उनको अपनी समस्याए बताऐगें और लोक प्राधिकारियों को भारतीय नागरिक की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य करना पडेगा। जो कोई भी लोक प्राधिकारी नही करना चाहता है तथा मोबाईल फोन और टेलीफोनों का उपयोग तो लोक प्राधिकारीयों के परिवार के सदस्य निजितौर पर करते है। जिससे टेलीफोन और मोबाईल के बिल के रूप में सरकारों के उपर करोड़ो रूपये मासिक का भार तो पडता ही है साथ में उपरोक्त प्राधिकारी बिना अपने कर्त्तव्यों का निवार्ह करें मुत का वेतन लेकर भारतीय नागरिकों के उपर बेकार का आर्थिक भार डाल रहे है। क्योंकी जो वेतन सरकारे इन निकम्मे लोक प्राधिकारियों को दे रही है। वह धन भारत के नागरिको से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से वसूल रही है। इसलिए हर भारतीय नागरिक को सवैंधानिक अधिकार है कि सरकारों के द्वारा उनकी सेवा के लिए नियुक्त किये गए लोक सेवकों/लोक प्राधिकारियों जिनका वेतन भारतीय नागरिकों की खून-पसीनें की कमाई में से दिया जा रहा है। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सभी लोक प्राधिकारियों का नाम, पदनाम, लोक प्राधिकारियों के कर्त्तव्यों, शक्तियों, कार्यालयों के पत्राचार पते पिन कोड़ सहित और केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों के द्वारा जनहित के लिए जनसाधारण के सर्म्पक में रहने के लिए लोक प्राधिकारियों को दिये गए मोबाईल या टेलीफोनों के असली नम्बरों की जानकारी हो। लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू हुए 5 वर्ष से भी ज्यादा समय बीत चुका है। लेकिन बहुत ही अवशोसजनक बात है कि आजतक भारतीय नागरिकों को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में लिखी सभी सुविधाएं नही मिल पाई है। जबकि विष्योक्त सुविधाए सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू होने के 120 दिन के अन्दर-2 भारतीय नागरिकों को मिलनी चाहिए थी। जिसको अपीलार्थी आयोग के सम्मुख पेश होकर साबित कर सकता है।
    
अतः अपीलार्थी माननीय आयोग से इस जनहित अपील के द्वारा प्रार्थना करता है कि आप सचिव भारत सरकार एवं केन्द्रीय मुख्य लोक प्राधिकारी, भारत के सभी राज्य के मुख्य सचिवों एवं राज्य मुख्य लोक प्राधिकारीयों, सभी राज्यों के जनसूचना आयोगों के मुख्य आयुक्तों और भारत के सभी केन्द्रीय शासित प्रदेशों के प्रशासक एवं मुख्य लोक प्राधिकारीयों को आदेश दे कि वे सभी अपने-अपने आधीन लोक प्राधिकरणों में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अध्याय-1 की धारा-4 की उपधारा-1 (लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं) की पालना करके अपनेे आधीन प्राधिकरणों की वेबसाईटों में अपने-2 प्राधिकरणों के सभी लोक प्राधिकारियों के नाम, पदनाम, लोक प्राधिकारियों के कर्त्तव्यों, शक्तियों, कार्यालयों के असली पत्राचार पते पिन कोड़ सहित, असली ई-मेल पते और केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों के द्वारा जनहित के लिए नागरिकों के सर्म्पक में रहने के लिए लोक प्राधिकारियों को दिये गए असल मोबाईल या टेलीफोनों के असली सर्म्पक नम्बरों को तुरन्त प्रभाव से दर्शांयें। जिससे नागरिकों को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का पूरा-2 लाभ मिल सके। आपकी अति कृपा होगी।




दिनांक 17.01.2011              
                                        (राजेश कुमार भारती)अपीलार्थी

इस जनहित अपील की एक-एक प्रति निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतू प्रेषित हैः-

1.    श्रीमति प्रतिभा सिंह पाटिल- महामहीम राष्ट्रपति भारत, राष्ट्रपति भवन,नई दिल्ली- 110004
2.    डा॰ मनमोहन सिंह- माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार, रेसिना हाल, साऊथ ब्लाक, नई दिल्ली.- 110101
3.    प्रमुख सचिव भारत सरकार केन्द्रीय सचिवालय नार्थ, ब्लाक, नई दिल्ली- 110001
4.    भारत के सभी राज्यों के मुख्य सचिव।
5.    भारत के सभी केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रशासक।
6.    भारत के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य जनसूचना आयोग।