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SOCIETY NAME SUGGESTED BY MR. JUSTICE MANMOHAN SARIN LOKPAL DELHI THE THEN JUSTICE HON'BLE
DELHI HIGH COURT IN CWP NO. 3390 OF 2000 RAJESH KUMAR BHARTI VS GOVT. OF INDIA
 
KriyaKalap
रक्त दान शिविर 2010
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रक्त दान शिविर 2011
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हमारा लक्ष्य सर्म्पूण शिक्षा

 

हमारे सोसायटी कार्यालय का कार्य केवल इतना भर ही नही है कि आपको इस सोसायटी के सदस्य बनना और चंदा एकत्रित करके आर्थिक तौर पर समृद्धि प्राप्त करना। यह सोसायटी भारत को दोबारा से उसके उस विश्वगरू के रूप में खड़ा करना चाहती है। जो प्राचीनकाल मे था और उस समय की कहावत थी की भारत की हर डाल पर सोने की चिड़िया का बसेरा है। यह तभी संभव हो सकता है जब भारत का अंतिम नागरिक पूर्णरूप से शिक्षित हो। आज भी भारत के पास हर तरह की मानसिक, शारीरिक और आर्थिकतौर पर सम्पन्नता है। लेकिन हर नागरिक का पूर्णरूप से शिक्षित न होने के कारण हम वैज्ञानिक सोच पर उस स्थान पर नही है। जहां हमें होना चाहिए। इसलिए इस वेबासाइट का निर्माण हमारे सोसायटी कार्यालय के द्वारा मुख्यतौर पर चलाए गये मिशन जिसके अर्न्तगत अंतिम भारतीय तक भारत के संविधान की पालना में उसके सैंविधानक अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी पहुचाने और उसको सम्पूर्ण तरीके से शिक्षित करने  का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य के पूर्ण होने पर हमारे भारतवर्ष से भ्रष्टाचार और अपराध जड़ से अपने आप ही समाप्त हो जायेगा। भ्रष्टाचार और अपराधों का पूर्ण रूप से जड़ से समाप्त होने पर भारत अपने आप ही स्वतः विश्वगरू के स्थान पर आ जायेगा।

     अब आप सोचेगें कि यह पूर्णरूप से शिक्षित होना क्या है। इसके बारे में मैं कहना चाहूगां  कि वर्तमान में जो भारतीय शिक्षानिति है। उसके अर्न्तगत हर प्रकार की उच्च शिक्षा का तो प्रबंध है। लेकिन उसका दायरा भी सीमित है। क्योंकी आर्थिक तौर पर सुदृढ़ व्यक्ति के बच्चे ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते है। सर्वप्रथम तो मै जन साधारण को बताना चाहता हूं कि भारत की वर्तमान  शिक्षानिति की आलोचना करना चाहूंगा। पूरे विश्व में किसी भी प्रकार का ज्ञान कोई व्यक्ति पूर्णरूप से जब ले सकता है। जब वह ज्ञान उसकी मातृ भाषा में दिया जाए। भारत की शिक्षा निति जो अपने आप में सम्पूर्ण नही है, इसके उल्ट है। मैं भारत के उन व्यक्तियों के ऊपर कटाक्ष करना चाहता हूं जो अपने आपको बुद्धिजीवी कह कर भारत के आम नागरिकों को गुमराह करते है और अपने आपको बुद्धिजीवी दर्शाने के लिए समाचार पत्रों और दूरदर्शनों पर तथाकथित भाषण के द्वारा अग्रेजी भाषा का विरोध करके हिन्दी भाषा को अपनाने की बात कहते है। उनकी इस बात से बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि वह नही चाहते कि निम्नवर्ग के बच्चे उनके बच्चो के समान उच्च शिक्षा प्राप्त करें। क्योंकी उपरोक्त तथाकथित बुद्धिजीवियों के बच्चे तो महगें स्कूलों में अग्रेजी माध्यम से ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेते है। लेकिन निम्न वर्ग को यह कह कर गुमराह कर देते है कि अग्रेजी तो अग्रेजों की भाषा है। हम भारतीय है। इसलिए हमें अग्रेजी भाषा को त्याग कर हिन्दी भाषा अपनानी चाहिये। क्या उपरोक्त बुद्धिजीवी यह नही जानते? हिन्दी भाषा को विकसित करने के लिए आजतक किसी ने भी सरकार ऊपर दबाव नही दिया? उन तथाकथित बुद्धिजीवीयों को मैं बताना चाहूंगा कि कोई भी उच्च शिक्षा अग्रेंजी भाषा के बिना ग्रहण नही की जा सकती। जैसे कि हिन्दी भाषा से विज्ञान, मेडिकल, इन्जीनीयरिगं, अकाउन्टैंसी, आर्कीटैक्ट, भारतीय रवैन्यूसेवा और भारतीय विदेशी सेवा आदि-2 ग्रहण नही की जा सकती। क्योंकी तथाकथित बुद्धिजीवीयों के एक वर्ग के षड़यन्त्र के तहत भारत में आजतक हिन्दी भाषा को विकसित ही नही किया है। क्योंकी कहीं निम्न वर्ग के बच्चे उनके बच्चों के समान उच्च शिक्षा ग्रहण ना कर सकें। अगर निम्नवर्ग के बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर लेते है तो उपरोक्त तथाकथित बुद्धिजीवीयों के बच्चों की गुलामी कौन करेगा। भारत में अनेकों भाषाओं का प्रचलन है और जो वर्तमान शिक्षा निति है। वह उन नागरिकों की मातृभाषा तो दूर की बात है। इस शिक्षा निति में उच्च शिक्षाएं हमारी राष्ट्रीय भाषा हिन्दी तक में उपलब्ध नही है तो आप ही बतायें कि इस शिक्षा निति से जो अपने आप मे सम्पूर्ण रूप से विकसित नही है। भारत का अंतिम व्यक्ति कैसे पूर्णरूप से शिक्षित हो सकता है? निम्न वर्ग का विद्यार्थी जैसें-तैसे वर्तमान शिक्षा को तो प्राप्त कर लेगा। लेकिन उच्च शिक्षा ग्रहण नही कर पाऐगा।

       अब सम्पूर्ण शिक्षा के बारे में चर्चा करते है कि भारतीय शिक्षा निति सम्मपूर्ण रूप से अधूरी है। क्योंकी भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। लेकिन भारत के किसी भी बुद्धिजीवी ने आजतक यह आवाज नही उठाई कि हिन्दी भाषा को विकसित किया जाये। क्योंकी कोई भी उच्च शिक्षा वर्तमान समय में हिन्दी माध्यम से प्राप्त नही की जा सकती। क्योंकी सभी उच्च शिक्षाएँ अग्रेजी माध्यम से बनाई गई है। उच्च शिक्षाओं में जो शब्द उपयोग किये जाते है। वह शब्द हिन्दी के शब्दकोष मे नही है। अगर है तो वे इतने कठीन है कि वे जल्द से समझ ही नही आते। वह शब्द केवल अग्रेजी के शब्दकोष में उपलब्ध है। जिसके कारण हिन्दी माध्यम से कोई भी उच्च शिक्षा प्राप्त नही की जा सकती। इसके अतिरिक्त यह बात कटु सत्य है कि  भारतीय शिक्षा निति केवल रोजगार पर आधारित है। जोकि ब्रिटिश इण्डियां कम्पनी और अग्रेजों ने लागू की थी। जिन्होनें भारत पर लगभग 200 वर्ष तक शासन किया, ने अपने निजि लाभ के लिए बनाई थी। क्योंकी वह नही चाहते थे कि भारतीय नागरिक मूलरूप में शिक्षित हो। उनका मकसद भारत जैसे सामाजिकरूप, मानसिकरूप और आर्थिकरूप से समृद्ध भारतवर्ष से केवल मुनाफा कमाना था न कि मूलरूप से हमें शिक्षित करना। अगर भारतीय शिक्षा निति में समाजिक, नैतिक और कानूनी आधार पर बदलाव किया जाये जैसे कि विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम मे प्राथिमिक स्तर से उच्च शिक्षा पूर्ण होने तक ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किये जाये जिसमें रोजगार के साथ-2 उनको समाजिक, नैतिक, सैंविधानिक और कानूनी, मूलअधिकारों, मूल-कर्तव्यों जानकारी दी जाये। वर्तमान शिक्षा निति के कारण ही हमारे देश में भ्रष्टाचार और अपराधों का स्तर ऊँचा उठता जा रहा है। क्योंकी आम नागरिकों को सैंविधानिक ज्ञान, सैंविधानिक मूल अधिकारों और मूल-कर्तव्यों का ज्ञान ही नही है।

       आप सोचें कि अगर आम आदमी को भारत के संविधान के अनुच्छेदों, भारतीय दण्ड संहिता (आई॰पी॰सी॰), दण्ड प्रकियां संहिता (सी.आर.पी.सी.), सिविल प्रकिया संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, पंचायती राज अधिनियम, नगर पालिका अधिनियम, यातायात अधिनियम और पुलिस अधिनियम आदि की मुख्य धाराओं की जानकारी हो तो कोई भी भारतीय नागरिक न तो भ्रष्ट बन सकता है और न ही  अपराधी बन सकता। क्योंकी उसको पता होगा कि किस गलत कार्य करने का क्या दण्ड मिलेगा और उसमे गलत कार्य करने से पहले यह डर होगा कि इस असैंविधानिक (अपराधिक) कार्य करने से मुझे क्या दण्ड मिल सकता है। इस तरह के ज्ञान का यह लाभ होगा कि 99 प्रतिशत अपराध तो स्वतः ही नही होगें। बाकि रही 1 प्रतिशत की बात तो वह हमारा काबिल प्रशासन उस अपराध को भी नही होने देगा। इसका अर्थ यह कि भारत 100 प्रतिशत अपराध मुक्त होगा। लेकिन यहां बात एक दम उल्ट है। उक्त आम नागरिक को भारतीय दण्ड संहिता (आई॰पी॰सी॰)का ज्ञान असैंविधानिक कार्य करने के बाद यानि अपराध करके होता है। मेरी मुलाकात इस तरह के कई अपराधिक व्यक्तियों  से हुई है, जो पहले आम सभ्य नागरिक थे। लेकिन किन्ही निजि कारणो या मजबूरी मे उनसे उनके द्वारा आपराधिक कार्य हो गये। उनका कहना यह होता है कि अपराधों से जुड़ने के बाद और न्यायलायों में पेशी होते-2 वह वकिल बन गये है। बस फर्क इतना है कि वकिलों पास डिग्री है और हमारे पास नही है। कितने दुःख कि बात है कि आम भारतीय नागरिक को अपने संविधान के अर्न्तगत आने वाली भारतीय दण्ड संहिता (आई॰पी॰सी॰) का ज्ञान भी अपराध करने के बाद ही होता है। जिसके बाद होता यह है कि अपराधी सजा से बचने के लिए कानूनी की काटों को ढूढता है। जिससे अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है।

    अब हम भ्रष्टाचार के बारे चर्चा करते है। आज भारत के उच्च से उच्च शिक्षित भारतीय नागरिकों को पूर्णरूप से सैंविधानिक ज्ञान नही है। चाहे वह लॉ का विद्यार्थी ही क्यों ना रहा हो। क्योंकी हमारी शिक्षा निति ने उसे भी बांटकर रख दिया है। जैसे सिविल लॉ और क्रिमनल लॉ जिसके कारण जिस विद्यार्थी ने सिविल लॉ के अर्न्तगत कानूनी शिक्षा प्राप्त की हो। उसे सिविल लॉ का ज्ञान होगा और जिसने क्रिमनल लॉ के अर्न्तगत शिक्षा ग्रहण की उसे केवल क्रिमनल लॉ के बारे जानकारी होगी। अपवाद जरूर हो सकता है कि किसी ने अपने ज्ञान के लिए सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया हो। आज की शिक्षा निति के यह हाल है कि पुलिस विभाग के एक छोटे से कर्मचारी से उच्च शिक्षित व्यक्ति डर जाता है। इसका कारण यह है कि उस उच्च शिक्षित व्यक्ति को उस कर्मचारी की सैंविधानिक बाघ्याताओं का ज्ञान नही है। हांलाकि उस कर्मचारी को सरकार के द्वारा जनता की सेवा के लिये नियुक्त किया जाता है। अगर उस उच्च शिक्षित व्यक्ति को किसी समस्या के समाधान के लिये किसी उच्च प्राशासनिक अधिकारी से मिलना हो तो आप ही अदांजा लगा सकते है। वह कैसे अपनी समस्या का समाधान करेगा? या तो वह किसी समाजिक (रिश्तेदारियां, राजनैतिक) सिफारिश लेकर जायेगा या फिर उस प्रशासनिक अधिकारी कार्यालय के किसी भ्रष्ट कर्मचारी को रिश्वत देकर अपनी समस्या का समाधान करवायेगा। लेकिन उसे सैंविधानिक ज्ञान हो तो वह कभी भी रिश्वत नही देगा। क्योंकी कितना भी बडा पदाधिकारी हो। उसकी कानून के अनुसार अपना कर्तव्यों करने की कानूनी बाध्यतायें है और उन बाध्यताओं की जानकारी आम नागरिक को हो तो इस देश में भ्रष्टाचार स्वतः ही जड़ से मिट जायेगा। जिनकी जानकारी हम सोसायटी कार्यालय के मिशन में अपने व्यस्थ जीवन से कुछ समय निकाल कर अपनी वेबसाईट  के माध्यम से देते रहेगे।

                            राजेश कुमार भारती- राष्ट्रिय अध्यक्ष